पटना न्यूज डेस्क: पटना उच्च न्यायालय ने भागलपुर के जिलाधिकारी (DM) द्वारा 2021 में पारित एक आदेश को रद्द कर दिया है। यह मामला 57 साल पुराने भूमि विवाद से जुड़ा है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि प्रशासनिक अधिकारी भूमि के स्वामित्व (Title) के संबंध में सिविल कोर्ट द्वारा दिए गए स्थापित निष्कर्षों और निर्णयों की अनदेखी नहीं कर सकते।
न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडे की पीठ भूमि मालिक के पोते द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने भागलपुर कलेक्टर के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने उनके परिवार की लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी (भूमि रिकॉर्ड) को संरक्षित करने वाले पिछले निर्णय को उलट दिया था। कोर्ट ने पाया कि प्रशासनिक स्तर पर कानूनी तथ्यों को नजरअंदाज किया गया।
उच्च न्यायालय ने 10 अप्रैल को दिए अपने आदेश में कलेक्टर की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा, "यह न्यायालय इस तथ्य को समझने में असमर्थ है कि भागलपुर के कलेक्टर ने दोनों पक्षों की दलीलों को शब्दशः दर्ज करने के बावजूद मामले के तथ्यों का सही आकलन कैसे नहीं किया। इस आधार पर विवादित आदेश को बिना न्यायिक मस्तिष्क (Judicious Mind) के प्रयोग के पारित माना जा सकता है।"
यह निर्णय उन मामलों के लिए एक नज़ीर पेश करता है जहाँ प्रशासनिक अधिकारी अपनी शक्तियों का प्रयोग करते समय सिविल कोर्ट के फैसलों को दरकिनार कर देते हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी भूमि का शीर्षक (Title) सिविल कोर्ट द्वारा तय किया जा चुका है, तो राजस्व अधिकारी या जिलाधिकारी उसमें हस्तक्षेप कर जमाबंदी रद्द करने जैसा कदम नहीं उठा सकते।